Padma Shri Teejan Bai, a Pandavani folk artist from Chhattisgarh, passes away after a prolonged illness : तीजन बाई की प्रतिभा ने भारत की सीमाएँ पार कर दीं। वे केवल देश के विभिन्न राज्यों में ही नहीं, बल्कि फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन और रूस जैसे देशों में भी गईं और वहाँ अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
Padma Shri Teejan Bai, a Pandavani folk artist from Chhattisgarh, passes away after a prolonged illness : चिरनिद्रा में लिन हुईं पांड़वानी की मालिका-छत्तीसगढ़ की लोक गायिका का पुण्य स्मरण-डॉ. तीजन बाई, छत्तीसगढ़ की विश्व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका, जिन्होंने महाभारत की कथाओं को अपनी ओजस्वी आवाज़ और अभिनय से जीवंत किया। 5 जुलाई 2026 को उनका निधन। जानें उनकी कला, नवाचार, अंतर्राष्ट्रीय पहचान और पद्म पुरस्कारों की कहानी।छत्तीसगढ़ की माटी ने अनेक विभूतियाँ दी हैं, परंतु डॉ. तीजन बाई का नाम उस माटी की आत्मा की तरह है-जो सदियों पुरानी कथा-परंपरा को अपनी दमदार आवाज़ और देह-भाषा से ऐसा जीवंत कर देती थी मानो महाभारत का युद्ध आँखों के सामने घटित हो रहा हो। 12 वर्ष की अल्पायु में ही जब उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह बालिका एक दिन पंडवानी को ग्रामीण परिवेश से निकालकर पेरिस, लंदन, मॉस्को जैसे शहरों के सभागारों तक ले जाएगी। 5 जुलाई 2026 को रायपुर के एम्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम साँस ली, पर उनकी वाणी की गूँज आज भी हर उस श्रोता के कानों में बसी है जिसने कभी उन्हें सुना। यह लेख उनके जीवन, कला, नवाचार, वैश्विक पहचान और प्राप्त सम्मानों को संजोने का एक विनम्र प्रयास है।
पंडवानी शैली और नवाचार-
Pandvani Style and Innovations
पंडवानी का अर्थ है-पांडवों की गाथा का गायन। यह छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोक विधा है, जिसमें महाभारत के प्रसंगों को संगीतबद्ध करके सुनाया जाता है। तीजन बाई ने इस विधा की ‘कापालिक’ शैली को अपनाया-जो अपने आप में सबसे चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। इस शैली में कलाकार खड़ा रहता है, एक हाथ में तानपूरा थामे, और अपने पूरे शरीर, आँखों, भौहों तथा स्वर के उतार-चढ़ाव से हर पात्र को अलग-अलग चरित्र देता है। तीजन बाई की विशेषता यह थी कि वे केवल गाती नहीं थीं-वे अभिनय करती थीं। द्रौपदी का चीरहरण हो या भीष्म की शय्या, उनकी आवाज़ में करुणा, क्रोध, वीरता और शांतता-सभी रस एक साथ उमड़ते थे। उन्होंने पारंपरिक बोलों में नया जान फूंका, ताल और लय में प्रयोग किए, और इस कला को इतना लचीला बनाया कि आधुनिक दर्शक भी उससे जुड़ सके। उनके नवाचार ने पंडवानी को ‘लोक रंगमंच’ का दर्जा दिया, जहाँ संगीत, नृत्य और नाट्य-तत्व एक साथ विद्यमान थे।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पहचान-
National and International Recognition
तीजन बाई की प्रतिभा ने भारत की सीमाएँ पार कर दीं। वे केवल देश के विभिन्न राज्यों में ही नहीं, बल्कि फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन और रूस जैसे देशों में भी गईं और वहाँ अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय लोक महोत्सवों में जब उन्होंने तानपूरा उठाया, तो विदेशी दर्शक उनके अभिनय और स्वर-शक्ति के आगे घंटों तक स्तब्ध बैठे रहे। उनकी इस सफलता ने भारतीय लोक संस्कृति को वैश्विक मानचित्र पर एक नई पहचान दी। वे इस बात की जीती-जागती मिसाल बनीं कि गाँव की मिट्टी में पली कला, बिना किसी फिल्मी या शास्त्रीय प्रशिक्षण के, विश्व मंच पर देश का नाम रोशन कर सकती है। उनके प्रदर्शनों को यूरोपीय समीक्षकों ने “भारतीय आत्मा का साक्षात् रूप” कहकर सराहा।

सम्मान और पुरस्कार-
Honors and Awards
भारत सरकार ने डॉ. तीजन बाई की अतुलनीय कला को देश के तीनों सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया-
- 1987 में पद्म श्री,
- 2003 में पद्म भूषण,
- 2019 में पद्म विभूषण।
यह क्रम उनके निरंतर उत्थान और कला के प्रति समर्पण को दर्शाता है। इसके अलावा उन्हें अनेक राज्य स्तरीय एवं राष्ट्रीय अकादमी पुरस्कार भी मिले। “डॉक्टर” की उपाधि से विभूषित यह साधारण पृष्ठभूमि की महिला अपनी प्रतिभा के दम पर भारतीय कला जगत की सबसे ऊँची शिखर पर पहुँची। उन्होंने कभी किसी बड़े मंच पर अपनी गरीबी या जाति को बहाना नहीं बनाया; बल्कि उसे अपनी कला की ताकत से मिटा दिया।
अंतिम यात्रा और विरासत-
Final Journey and Legacy
लंबी बीमारी के बाद 5 जुलाई 2026 को रायपुर के एम्स अस्पताल में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश की सांस्कृतिक धरा ने एक अनमोल रत्न खो दिया। लेकिन उनकी विरासत-कापालिक पंडवानी, अभिनय की वह विधा, और महाभारत को जन-जन तक पहुँचाने का उनका सशक्त माध्यम-आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। तीजन बाई ने साबित किया कि लोक कला न तो छोटी होती है, न कमज़ोर; बस उसे उठाने वाले का आत्मविश्वास चाहिए। उनके संगीत की ऊर्जा, उनके मंचीय व्यक्तित्व और उनकी वाणी में बसी तपस्या को शब्दों में बाँध पाना शायद असंभव है-पर उनके अनुयायी और प्रशंसक उन्हें हमेशा उसी ‘ओज’ के साथ याद करेंगे।