Maithili Thakur In politics : लोकगायिका ‘मैथिली’ कहीं इंडिया की ‘जेन’ न बन जाए ! फैंस भयभीत
Maithili Thakur In politics : लोकगायिका ‘मैथिली’ कहीं इंडिया की ‘जेन’ न बन जाए ! फैंस भयभीत – कहीं मैथिली इंडिया की जेन न बन जाए, काश… ये चुनाव मैथिली ये चुनाव हार जाए ,ये कोई कटाक्ष नहीं, बल्कि एक सच्ची चिंता है ,उस कलाकार के लिए जिसकी आवाज़ ने भारत के लोकसंगीत को फिर से जगा दिया। लेकिन अब वही बच्ची, जिसकी गायकी में देश की मिट्टी की महक थी, राजनीति के रण में उतर चुकी है। सवाल जीत या हार का नहीं, बल्कि उस मासूम आत्मा के भविष्य का है, जोअब सत्ता की गलियों में भटकने जा रही है। क्या कम उम्र में मिली शोहरत और सत्ता का मोह किसी कलाकार की आत्मा छीन लेता है? जेन पार्क से लेकर मैथिली ठाकुर तक, ये कहानी सिर्फ सफलता नहीं ,चेतावनी है।
जेन पार्क – लॉटरी की विजेता, जीवन की हारी हुई कहानी
लंदन की जेन पार्क ने 17 साल की उम्र में 8.4 करोड़ रुपये की लॉटरी जीती थी। सबको लगा — यह तो सपनों का सच होना है! लेकिन असल में वह शुरुआत थी उसके अकेलेपन की, उलझनों की।
दोस्त दूर हो गए, झूठे रिश्ते पास आ गए। लोगों ने उसे समझाया कि अब वो “अमीरों की दुनिया” में है, लेकिन जेन ने पाया कि वह दुनिया सबसे खाली थी।
उसने एक दिन कहा था -“मेरे पास सब कुछ है, सिवाय किसी अपने के। काश, मेरे पास ये पैसे न होते।”
धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि इतनी कम उम्र में सब कुछ मिल जाना दरअसल एक सज़ा है। उसने दुनिया को चेतावनी दी -“किसी कीमत पर किसी बच्ची की मासूमियत की हत्या मत कीजिए।”
सुनिधि चौहान की चुप्पी , ‘कभी-कभी मैं चाहती हूं कि बच्चे न जीतें’
जेन की तरह ही सुनिधि चौहान की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। 13 साल की उम्र में ‘मेरी आवाज़ सुनो’ की विजेता बनीं और फिल्म ‘शस्त्र’ से करियर शुरू किया। बचपन में मिली प्रसिद्धि ने उन्हें स्टार बना दिया, लेकिन इंसान भी तो बच्चा था – उस उम्र में शोहरत और निर्णय दोनों का बोझ भारी पड़ गया।
एक इंटरव्यू में सुनिधि ने कहा था – “आजकल बहुत से बच्चे रिएलिटी शो जीत रहे हैं… कभी-कभी मैं चाहती हूं कि वो न जीतें, क्योंकि जीतने के बाद उनकी ज़िंदगी और उनकी मासूमियत खो जाती है।”उनकी आंखों की खामोशी बता रही थी कि सफलता अगर समय से पहले मिले, तो वह वरदान नहीं, परीक्षा बन जाती है।
मैथिली ठाकुर – सुरों की बेटी, सियासत की दहलीज़ पर
मैथिली ठाकुर – वो नाम, जिसने लोकसंगीत को नई पहचान दी। उसकी आवाज़ में गांव, परंपरा और भावनाओं की सुगंध है। वो कानूनी रूप से भले वयस्क हों, पर राजनीति की परिपक्वता से अब भी बहुत दूर हैं।
आज वही बच्ची, जिसकी तान ने लाखों दिलों को छुआ, अब चुनावी मंचों पर खड़ी है। लोग कह रहे हैं – “बेटी, तेरी आवाज़ विधायक के भाषण से कहीं ज्यादा असरदार है। तेरे सुरों में जो ताकत है, वो किसी टिकट या कुर्सी से नहीं आती।” राजनीति, कला का विस्तार नहीं – उसका अंत हो सकती है। क्योंकि यहां भावनाओं की जगह गणना होती है, और गणना में कला अक्सर हार जाती है।
कला बनाम राजनीति – क्या दोनों साथ चल सकते हैं ?
इतिहास बताता है – कलाकार जब राजनीति में उतरते हैं, तो अक्सर अपनी मौलिकता खो देते हैं। कंगना रनौत हों या स्मृति ईरानी – कला से मिली पहचान धीरे-धीरे सियासत की भीड़ में गुम हो गई।राजनीति एक टाइगर की सवारी है – एक बार चढ़ गए तो उतरना मुश्किल। कला जहां आत्मा से चलती है, वहीं राजनीति रणनीति से। और जब आत्मा, रणनीति के आगे झुकती है, तो कलाकार की सबसे बड़ी हार वहीं से शुरू होती है।
निष्कर्ष – अगर मैथिली हारी, तो शायद हम जीत जाएंगे
आज मैथिली ठाकुर के फैंस सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि चिंतित हैं। वे सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं – “बेटी, तू गा। राजनीति के मंच नहीं, सुरों की चौपाल तेरे लिए बनी है। तेरा हुनर किसी चुनाव से बड़ा है।”कम उम्र में मिली शोहरत, पैसा या सत्ता, अक्सर एक चमकदार लॉटरी की तरह होती है – जो थोड़ी देर के लिए आंखें चौंधिया देती है, पर धीरे-धीरे आत्मा को अंधा कर देती है।जेन पार्क ने कहा था – “काश मेरे पास ये पैसे न होते।” और शायद आने वाले वक्त में मैथिली को भी यही न कहना पड़े — “काश मैंने वो टिकट न लिया होता।”कला, राजनीति से कहीं ज्यादा स्थायी है। राजनीति जीत दिला सकती है, पर प्रतिभा ही अमर बनाती है।
अंतिम पंक्ति – राजनीति की बिसात पर किसी कलाकार की मासूमियत को मत कुर्बान कीजिए। क्योंकि जब कोई कलाकार हारता है, तो पूरा समाज कुछ खो देता है।