Importance of Guru Purnima Significance And Hindi Arti Lyrics : गुरु पूर्णिमा के दिन अवश्य गाएं गुरु की प्रिय आरती, यह आरती "गुरु की 'शोभा' (Glory) विशाल (Vast) है। इसका अर्थ है कि गुरु की महिमा का वर्णन शब्दों में संभव नहीं है।
Importance of Guru Purnima Significance And Hindi Arti Lyrics : गुरु पूर्णिमा के दिन अवश्य गाएं गुरु की प्रिय आरती, जानें गुरु की महिमा का महत्व एवं उपयोगिता-गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर “आरती दीन दयाल गुरु की” का गहन अर्थ जानें। यह लेख गुरु को ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रूप में वर्णित इस दिव्य स्तोत्र की उपयोगिता एवं महत्व को विस्तार से समझाता है।गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल एक तिथि नहीं, बल्कि वह दिव्य अवसर है जब गुरु और शिष्य के मध्य का अदृश्य बंधन और भी मजबूत हो जाता है। यह वह दिन है जब महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया और मानवता को ज्ञान का मार्ग प्रदान किया। इस पावन अवसर पर गुरु की आरती उतारना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि कृतज्ञता और समर्पण का सर्वोच्च रूप है। प्रस्तुत है दिव्य स्तोत्र “आरती दीन दयाल गुरु की” एक ऐसी रचना जो गुरु के करुणामय स्वरूप, उनके विश्वरूप और उनकी परमात्मा के साथ एकता को दर्शाती है। गुरु पूर्णिमा पर इस आरती को गाने से न केवल मन शांत होता है, बल्कि जीवन के कष्ट (भव भय) भी दूर होते हैं। आइए, इस लेख के माध्यम से हम इस आरती की प्रत्येक पंक्ति को गहराई से समझें और जानें कि गुरु पूर्णिमा पर इसके जाप की उपयोगिता क्यों अत्यधिक बढ़ जाती है।
गुरु पूर्णिमा-यानि अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला पर्व
Guru Purnima-The Festival That Leads from Darkness to Light
गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा) को ही “व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है। यह वर्षा ऋतु का आरंभ है, जो मानसिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। इस दिन गुरु की आरती का विशेष महत्व है क्योंकि इस दिन ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) सर्वाधिक सक्रिय होती है। इस आरती को गाने से साधक के अंदर सकारात्मक कंपन (Positive Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जो उसे जीवन के मोह-माया से बाहर निकालने में सहायक होते हैं।
गुरु पूर्णिमा को गाई जाने वाली लोकप्रिय संपूर्ण आरती-Complete Arti Lyrics
संपूर्ण आरती प्रस्तुत है
- आरती दीन दयाल गुरु की, संतन के प्रतिपाल गुरु की।
- गुरु ही ब्रह्मा शंभु मुरारी, पारब्रह्म गुरु भव भय हारी।
- है सबके सच्चे हितकारी, परमेश्वर गुरु मूर्ति धारी।
- शोभा बनी विशाल गुरु की। आरती दीन दयाल गुरु की॥
- आरती दीन दयाल गुरु की, संतन के प्रतिपाल गुरु की।
- अंधकार को दूर करो प्रभु,ज्ञान की ज्योति से हमें भरो प्रभु
- तुमसे ही सब आस हमारी सुनो अर्ज हे गुरु देव हमारी
- आए शरण तेरी कुछ बन जाएं पूरण करो ये चाह अपने जनों की
- आरती दीन दयाल गुरु की, संतन के प्रतिपाल गुरु की।
“दीन दयाल” की करुणा-गुरु पूर्णिमा पर क्यों करें इसका स्मरण ?
The Compassion of “Deen Dayal”- Why Remember This on Guru Purnima
इस आरती का पहला पद है”आरती दीन दयाल गुरु की”। ‘दीन दयाल’ का अर्थ है ‘दीनों (असहायों, शोषितों) पर दया करने वाला’। गुरु पूर्णिमा के दिन हम उस गुरु की आरती उतारते हैं जो न केवल ज्ञानी है, बल्कि अत्यंत करुणामयी भी है। इस दिन इस पंक्ति का उच्चारण करते हुए यदि हम अपनी सभी कमजोरियों (दीनता) को गुरु के चरणों में अर्पित कर देते हैं, तो गुरु उन सभी को अपनी करुणा से धो देते हैं। दूसरा भाग “संतन के प्रतिपाल गुरु की”हमें बताता है कि गुरु सज्जनों और साधु-संतों का पालन-पोषण करते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इसका जाप करने से हमारे अंदर सात्विकता (Satvikta) बढ़ती है और बुरी संगत स्वतः दूर हो जाती है।

त्रिदेवों का स्वरूप-गुरु में बसा ब्रह्मा-विष्णु-महेश
The Form of the Trinity-Brahma, Vishnu, and Mahesh Reside in the Guru
आरती की सबसे गूढ़ पंक्ति है-“गुरु ही ब्रह्मा शंभु मुरारी, पारब्रह्म गुरु भव भय हारी।”गुरु पूर्णिमा के दिन इस पंक्ति का विशेष चिंतन (मनन) करना चाहिए। यह बताती है कि गुरु ही सृष्टि के रचयिता (ब्रह्मा), पालनहार (विष्णु/मुरारी) और संहारक (शिव/शंभु) हैं। यहाँ तक कि वह ‘पारब्रह्म’ (परम तत्व) हैं, जो ‘भव भय’ (जन्म-मृत्यु के भय) को नष्ट करने वाले हैं। जब हम गुरु पूर्णिमा पर इस पंक्ति को गाते हैं, तो हम मानसिक रूप से यह स्वीकार करते हैं कि हमारे जीवन में जो भी उतार-चढ़ाव (रचना-पालन-संहार) हो रहे हैं, गुरु उन सबके नियंता हैं। इस दिन इसका उच्चारण करने से हम संसार के भय (मृत्यु, असफलता, रोग) से मुक्त होने की शक्ति प्राप्त करते हैं।
सच्चे हितकारी-गुरु का परमेश्वर रूप और उपयोगिता
The True Well-Wisher-The Divine Form of the Guru and Its Utility
तीसरी पंक्ति है-“है सबके सच्चे हितकारी, परमेश्वर गुरु मूर्ति धारी।”गुरु पूर्णिमा पर यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि गुरु का कोई पक्षपात नहीं होता। वह ‘सबके’ हितैषी हैं-चाहे भक्त हो या निंदक। वह ‘परमेश्वर’ का मूर्तिमान रूप हैं। गुरु पूर्णिमा के दिन जब हम इस पंक्ति का पाठ करते हैं, तो हमारी मानसिकता संकुचित (नarrow-minded) से विराट (broad) हो जाती है। हम सीखते हैं कि गुरु की कृपा केवल अपने लिए न मांगकर, सबके कल्याण के लिए माँगी जाए। यह आरती हमें ‘मैं’ (Ego) से ‘हम’ (We) की यात्रा करना सिखाती है, जो गुरु पूर्णिमा का मूल उद्देश्य है।
समापन और विशालता-गुरु की शोभा का अनंत विस्तार
Conclusion and Grandeur-The Infinite Expansiveness of the Guru’s Glory
अंतिम पंक्ति-“शोभा बनी विशाल गुरु की। आरती दीन दयाल गुरु की॥ “गुरु की ‘शोभा’ (Glory) विशाल (Vast) है। इसका अर्थ है कि गुरु की महिमा का वर्णन शब्दों में संभव नहीं है। गुरु पूर्णिमा पर इस पंक्ति को दोहराते हुए हम अपनी बुद्धि को उस परम सत्य के समक्ष झुकाते हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं है।