The Story Of Dholpur's Dacoit-Free Dang : धौलपुर के पुलिस अधीक्षक विकास सांगवान के अनुसार-आज धौलपुर जिले के डांग और बीहड़ पूरी तरह दस्यु विहीन हैं।
The Story Of Dholpur’s Dacoit-Free Dang : जगन गुर्जर से दस्यु विहीन डांग तक की कहानी के साथ, चंबल के बीहड़ों से आतंक का अंत-राजस्थान के धौलपुर जिले के डांग और बीहड़ अब पूरी तरह दस्यु विहीन हैं। जानिए कैसे कुख्यात डकैत जगन गुर्जर के आतंक के बाद पुलिस की सख्त कार्रवाई ने चंबल क्षेत्र को बदल दिया। पढ़िए पूरी कहानी।राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश-तीन राज्यों की सीमाओं को छूने वाली चंबल घाटी की गहरी बीहड़ें और दुर्गम डांग कई दशकों तक डकैतों की पनाहगाह रहे। यहां की खड्डों और घनी झाड़ियों ने न केवल अपराधियों को सुरक्षित आश्रय दिया, बल्कि आम जनता के मन में दहशत का ऐसा माहौल बना दिया कि रात होते ही गांव सूनने लगते थे। इन्हीं बीहड़ों में एक नाम ऐसा था जिससे तीनों राज्यों की पुलिस भी कांपती थी-जगन गुर्जर। 1998 से 2001 के बीच जगन गुर्जर का गिरोह धौलपुर, करौली, भरतपुर और मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में आतंक का पर्याय बन गया था। लूट, अपहरण, हत्या और रंगदारी की सैकड़ों वारदातों ने इस क्षेत्र को जहन्नुम बना दिया था। लेकिन आज वही डांग और बीहड़ पूरी तरह दस्यु विहीन हैं, और इस बात की गवाही धौलपुर पुलिस का आधिकारिक रिकॉर्ड भी देता है। यह है चंबल के आखिरी बड़े डकैत की कहानी, जिसने चार बार आत्मसमर्पण किया और अंततः जेल की चारदीवारी के भीतर अपनी कहानी समाप्त कर दी।
जगन गुर्जर का दूध बेचने वाले से लेकर कुख्यात डकैत तक का सफर
Jagan Gurjar,From Milkman to Notorious Dacoit
धौलपुर जिले के बसई डांग थाना क्षेत्र के भवूतीपुरा गांव में जन्मे जगन गुर्जर का बचपन एक आम ग्रामीण युवक जैसा था। वह साइकिल पर दूध बेचकर अपना गुजर-बसर करता था। लेकिन 1994 में एक घटना ने उसकी जिंदगी की दिशा पलट दी। बाबू महाराज मंदिर की कमेटी के सदस्यों ने प्रसाद वितरण को लेकर जगन के पिता शिवचरण गुर्जर का अपमान किया। पिता के इस अपमान से आहत जगन ने कमेटी के सदस्यों की पिटाई कर दी, और यहीं से शुरू हुआ उसका अपराधिक सफर। जगन ने बीहड़ के मोहन गुर्जर की गैंग में कदम रखा। पांच सालों तक उसने इस गैंग में रहकर लूट-पाट की वारदातों को अंजाम दिया। 1999 में जब उसके जीजा की हत्या के मामले में मोहन गुर्जर से विवाद हुआ, तो जगन ने मोहन को मार गिराया और खुद उसकी गैंग का सरदार बन बैठा। इसके बाद उसने अपने तीनों भाइयों को भी गैंग में शामिल कर लिया और तीन राज्यों में आतंक फैलाना शुरू कर दिया। जगन पर कुल 128 मामले दर्ज-जिनमें से 78 में बरी, 8 में दोषसिद्ध, 16 ट्रायल में, 6 जांचाधीन और 9 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज।
1998-से-2001 तक , आतंक का वह दौर
1998-2001, The Era of Terror
साल 1998 से 2001 के बीच जगन गुर्जर गिरोह का आतंक अपने चरम पर था। धौलपुर, करौली, भरतपुर के बयाना उपखंड और मुरैना जिले में उसकी दहशत थी। पुलिस थानों में सैकड़ों एफआईआर दर्ज हुईं। इस दौरान जगन की सबसे कुख्यात वारदातों में से एक थी-12 जून 2019 को धौलपुर के सायपुर-करनसिंह गांव में दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाना। इस घटना का वीडियो वायरल हो गया था और तीन राज्यों की पुलिस उसकी तलाश में जुट गई थी। सरकार ने सख्ती से निपटने के निर्देश दिए। तत्कालीन एसपी गोविंद गुप्ता से शुरुआत हुई और फिर बीजू जॉर्ज जोसेफ ने डांग और बीहड़ों में पुलिस की मजबूत मौजूदगी सुनिश्चित की।
पुलिस की रणनीति और पहला सरेंडर
Police Strategy and the First Surrender
पुलिस ने डांग और बीहड़ों में लगातार कॉम्बिंग अभियान चलाया। एक दिन में करीब 40 से 50 किलोमीटर तक सर्च ऑपरेशन चलता था। टीमें बीहड़ों में डेरा डालकर रहती थीं और हर दो दिन बाद टीम बदली जाती थी। इस दबाव की रणनीति रंग लाई। दस्यु हरिओम और राम लखन के एनकाउंटर में मारे जाने से जगन पर भारी दबाव बना। तत्कालीन बाड़ी सीओ केसर सिंह शेखावत की मध्यस्थता पर जगन ने बाबू महाराज मंदिर (थान) पर आत्मसमर्पण करने की बात कही। 2001 में पहली बार-जगन गुर्जर ने तत्कालीन एसपी बीजू जॉर्ज जोसेफ के समक्ष सरेंडर किया। इस सरेंडर के लिए तत्कालीन डीजीपी शांतनु कुमार ने सीओ शेखावत को प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित भी किया था।
चार बार आत्मसमर्पण, बार-बार वापसी
Four Surrenders, Repeated Returns
जगन गुर्जर ने कुल चार बार किया था आत्मसमर्पण –
जानिए क्रम वर्ष स्थान और समक्ष
- पहली बार – 2001- तत्कालीन एसपी बीजू जॉर्ज जोसेफ, धौलपुर,
- दूसरी बार – 30 – जनवरी 2009 करौली के देवनारायण मेले में,
- तीसरी बार – 19 – अगस्त 2018 तत्कालीन आईजी मालिनी अग्रवाल, भरतपुर,
- चौथी बार – फरवरी – 2022 करौली पुलिस के समक्ष,
विशेष-2001 में सरेंडर के बाद 2005 में रिहा होने पर उसने फिर से अपराध की दुनिया में कदम रखा, 2009 में भी उसने सरेंडर किया। 2018 में जब पुलिस ने फिर से उसे घेरा, तो उसने आईजी मालिनी अग्रवाल के समक्ष बयाना थाने में सरेंडर कर दिया। हर बार सरेंडर के पीछे पुलिस का लगातार दबाव, एनकाउंटर का खतरा और मुख्यधारा में लौटने का संदेश ही काम आया।
तीन राज्यों की पुलिस का समन्वय
Coordination of Three-State Police
जगन के खिलाफ अभियान में धौलपुर, करौली और मुरैना-तीनों जिलों की पुलिस ने समन्वय बनाकर काम किया।
- धौलपुर में बीजू जॉर्ज जोसेफ
- करौली में एम.एन. दिनेश
- मुरैना के पुलिस कप्तान
- तीनों अधिकारियों ने मिलकर यह साफ संदेश दिया कि दस्युओं की गतिविधियों पर सख्ती से लगाम लगानी होगी। नियमित कॉम्बिंग, एनकाउंटर और बीहड़ों में पुलिस की सक्रिय मौजूदगी ने दस्युओं के पसीने छुड़ा दिए।
मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास
Efforts to Rehabilitate into Mainstream
पुलिस प्रशासन ने केवल कार्रवाई ही नहीं की, बल्कि मध्यस्थों के जरिए दस्युओं को मुख्यधारा में शामिल होने का संदेश भी भेजा। इसके लिए इलाके के राजनेताओं और कुछ व्यक्तियों का सहयोग लिया गया। पुलिस का स्पष्ट संदेश था-“सरेंडर कर मुख्यधारा में आएं, नहीं तो अंजाम अच्छा नहीं होगा” जगन का पहला सरेंडर इसी रणनीति का परिणाम था।

डांग और बीहड़ अब दस्यु विहीन
Dang and Beehad Now Dacoit-Free
आज धौलपुर जिले के डांग और बीहड़ पूरी तरह दस्यु विहीन हैं। धौलपुर के पुलिस अधीक्षक विकास सांगवान के अनुसार-
आधिकारिक तौर पर वर्तमान में कोई सक्रिय दस्यु नहीं है। जो हैं, वह न्यायिक अभिरक्षा में जेल की चारदीवारी के भीतर हैं। पुलिस सूची में केवल इनामी बदमाश हैं, जिनके खिलाफ भी पुलिस लगातार अभियान चलाकर कार्रवाई करती है।”डांग और बीहड़ जहां कभी 100 से अधिक डकैत सक्रिय थे, आज वहां शांति है। चंबल की ये बीहड़ें, जो सदियों से डकैतों की शरणस्थली रहीं, अब अपराध मुक्त हो चुकी हैं।
जगन गुर्जर का अंत-The End of Jagan Gurjar
जून 2026 में अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल में जगन गुर्जर की हत्या कर दी गई। प्रारंभिक जांच के अनुसार, उसी बैरक में बंद कैदी विष्णु जाट ने तौलिए से गला घोंटकर उसकी हत्या की। 52 वर्षीय जगन गुर्जर के खिलाफ 100 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे। उसके परिजनों ने हत्या की सीबीआई जांच की मांग की। 1 जुलाई 2026 को उसका अंतिम संस्कार धौलपुर के उसके पैतृक गांव भवूतीपुरा में भारी पुलिस सुरक्षा के बीच किया गया।