Kaanch Hi Baans Ke Bahangiya Lyrics : छठ पर्व का,लोकसंस्कृति का अनमोल गीत – कांच ही बांस के बहंगिया गीत छठ पूजा की लोकपरंपरा का प्रतीक है। जानिए इस प्रसिद्ध गीत के बोल, अर्थ और सांस्कृतिक महत्ता। छठ पूजा – जो सूर्य देव और छठी मैया की आराधना का पर्व है। इसी पर्व के अवसर पर गाया जाने वाला “कांच ही बांस के बहंगिया” गीत, लोकजीवन की सादगी व श्रद्धा का अमर प्रतीक है। यह गीत न केवल भक्त की भावनाओं को प्रकट करता है, बल्कि समर्पण का भी चित्रण है जो व्रती छठ मैया की सेवा में करते हैं।
गीत के बोल – कांच ही बांस के बहंगिया
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए, बहंगी लचकत जाए।
होए ना बलम जी कहरिया, बहंगी घाटे पहुंचाए, बहंगी घाटे पहुंचाए।
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए, बहंगी लचकत जाए।
बाट जे पूछे ना बटोहिया, बहंगी केकरा के जाए, बहंगी केकरा के जाए।
तू तो आंधर होवे रे बटोहिया, बहंगी छठ मैया के जाए, बहंगी छठ मैया के जाए।
वह रे जे बाड़ी छठी मैया, बहंगी उनका के जाए, बहंगी उनका के जाए।
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए, बहंगी लचकत जाए।
गीत का अर्थ और भाव
गीत में एक व्रती या महिला अपने भक्ति-मार्ग की झलक दिखाती है। वह बांस की बनी बहंगी (एक लकड़ी की डंडी जिस पर दोनों ओर टोकरी टंगी होती है) में पूजा सामग्री रखकर घाट की ओर जा रही है।
“कांच ही बांस के बहंगिया” – यानी चिकने, चमकदार बांस से बनी सुंदर टोकनी।
“बहंगी लचकत जाए” – बहंगी चलते हुए लचक रही है, जो दृश्य को सौंदर्य और भक्ति से भर देता है।
“होए ना बलम जी कहरिया” – वह अपने जीवनसाथी से कहती है कि यह बहंगी भारी है, इसे घाट तक पहुंचाने में मदद करें।
जब कोई राहगीर पूछता है कि यह बहंगी किसके लिए जा रही है, तो वह उत्तर देती है –“बहंगी छठ मैया के जाए।” यह उत्तर केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि भक्ति का शुद्धतम रूप है ,बिना दिखावे के, बिना आग्रह के, केवल समर्पण के भाव में डूबा हुआ।
छठ मैया की पूजा में नारी की भूमिका
छठ पर्व का केंद्रबिंदु नारी ही है। वह उपवास रखती है, नदी में खड़ी होकर सूर्य को अर्घ्य देती है, और परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना करती है। “कांच ही बांस के बहंगिया” गीत में वही नारी भाव बोल उठता है – जो परिश्रम को पूजा मानती है और हर कठिनाई में भी श्रद्धा की मुस्कान रखती है। गीत में “बलम जी” शब्द यह भी दर्शाता है कि यह पर्व केवल नारी नहीं, परिवार के पूरे सहयोग का उत्सव है। पति-पत्नी, माता-पिता, बच्चे सभी इस आस्था में सहभागी होते हैं।
भोजपुरी लोकसंस्कृति और गीत की परंपरा
बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोकजीवन में गीत, पूजा का अभिन्न हिस्सा हैं। छठ के अवसर पर जब घाटों पर “कांच ही बांस के बहंगिया” गूंजता है, तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति, नदी, सूर्य और मनुष्य एक साथ गा रहे हों। यह गीत लोकधुनों की सादगी से भरा हुआ है बिना वाद्ययंत्रों के भी यह मन को छू जाता है। इसकी हर पंक्ति में गांव की मिट्टी, नदियों की लहरें और स्त्री के श्रम की सुगंध महसूस होती है।
सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश
“कांच ही बांस के बहंगिया” गीत केवल पूजा का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रतीक भी है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची पूजा वही है जिसमें श्रम, प्रेम और सादगी शामिल हो। गीत में नारी का परिश्रम, परिवार के प्रति समर्पण, और धर्म के प्रति आस्था तीनों का अद्भुत संगम है। यह गीत नारी के उस रूप को सामने लाता है जो त्याग में सौंदर्य और कठिनाई में विश्वास खोज लेती है।
निष्कर्ष – भक्ति की लचक में जीवन की लय
“कांच ही बांस के बहंगिया” केवल एक गीत नहीं, बल्कि लोकभक्ति की वह लहर है जो हर साल छठ पर्व पर गूंजकर जीवन में नई ऊर्जा भर देती है। यह गीत बताता है कि भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति है जिसमें श्रम भी है, सादगी भी और प्रेम की मधुरता भी।
जब बहंगी लचकती है, तो वह एक संदेश देती है “भक्ति का मार्ग कठिन जरूर है, पर जो मन श्रद्धा से भरा हो, उसके लिए हर कठिनाई संगीत बन जाती है।”